By: Shivam Mishraa
On 7th October, I picked up a pen not because I wanted to become a writer, but because my head felt too loud. I had heard about writing therapy earlier—how putting thoughts on paper can help with overthinking. Someone I trust, Bhartendu Vimal Dubey, casually suggested I give it a try. Nothing dramatic. Just a simple suggestion. I didn’t know then that it would end up becoming one of the most grounding habits of my life. Around that time, I was stuck in my own head. I wanted to grow, badly—but I wasn’t able to be my best self. I wanted discipline. I wanted structure. I wanted change. It started with what people online call the “winter arc.” Wake up early. 5 a.m. alarms. Cold showers. Running. Self-focus. From October till January or February—no excuses. I wanted that version of me. But reality didn’t match the plan. Even after setting alarms, I wasn’t waking up. I wasn’t getting things done. And because of that, I spent the entire day being hard on myself—feeling guilty, disappointed, frustrated. What I didn’t realize back then was that I wasn’t just failing at a routine; I was mentally punishing myself for it. So on the 7th of October, I bought a small notebook and decided to actually try writing therapy. I started simple. Why can’t I wake up? What’s stopping me? Why does dawn feel so heavy? What am I avoiding? Writing didn’t magically fix my schedule, but it did something more important—it showed me patterns. It made me realize how harsh I was on myself without even noticing. On paper, my thoughts looked different. Clearer. Less absolute. Over time, writing became more than just about waking up early. It helped me process a breakup I hadn’t fully faced. It helped me untangle family issues and long-standing tensions. It helped me understand fights with friends—especially my best friend. It helped me deal with gym motivation, work stress, and how colleagues treat me—and how I respond. When I write, I can step outside myself. I stop reacting and start observing. It’s like looking at my life from a third-person perspective—seeing the bigger picture instead of drowning in one emotion. I won’t pretend I was consistent from day one. I wasn’t. Some days I skipped. Some weeks I barely wrote. But slowly, the habit stuck. Now it’s 13th January, and writing has become my reset button. Whenever my thoughts pile up—whenever my mind feels crowded—I open the notebook and just start. No rules. No structure. Just honesty. And almost every time, I feel lighter afterward. Writing therapy didn’t turn me into a perfect version of myself. But it gave me clarity. And clarity changes everything. Sometimes, all you need is a pen, a few blank pages, and the courage to be honest with yourself.
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By: Bhartendu Vimal Dubey
त्योहार एक मौका होता है कि हम अपने जीवन के सभी लोगों को कम से कम एक बार याद करें। तो इस दिवाली आप एक शुरुआत कर सकते हैं - शुरुआत अपने मन की शांति के लिए, अपने मानसिक स्वास्थ्य के लिए, अपने मेंटल हेल्थ के लिए, और मेंटल वेलनेस के लिए। इस शुरुआत के साथ आप न केवल अपना कल्याण करेंगे, बल्कि अपनों का भी भला करेंगे। आपके जीवन में ऐसे बहुत सारे लोग होंगे जो आपसे बात करना चाहते हैं। अगर आप उन्हें कॉल कर देते हैं, उन्हें रिप्लाई कर देते हैं, तो उनका दिन बन जाता है। इस दिवाली मौका खोजिए — जो लोग भी आपसे बात करना चाहते हैं, उनसे आप बात कीजिए, उन्हें कॉल कीजिए, दिवाली की शुभकामनाएँ दीजिए, हालचाल पूछिए। पूरे साल हम उन लोगों से बात करने का प्रयास करते रहते हैं, जिनसे हम बात करना चाहते हैं, जो हमारे पसंदीदा होते हैं, जो हमारे क्रश होते हैं लेकिन इस त्योहार, इस सीजन, इस दिवाली का अवसर विशेष है। इसका फायदा उठाइए और ऐसे लोगों को कॉल कीजिए — जो आपको अपना क्रश मानते हैं, जो आपसे बात करना चाहते हैं, जो आपके कॉल या मैसेज का इंतजार करते हैं। विश्वास मानिए, इससे आपके मानसिक स्वास्थ्य को भी बहुत लाभ मिलेगा, और सामने वाले का भी मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होगा। तो इसे एक बार करके देखिए। साल में ऐसे दो-तीन मौके आते हैं जब हम ऐसी चीज़ें कर सकते हैं। ऐसी चीज़ों को जरूर करना चाहिए। कुछ प्रायोरिटी लिस्ट बनाइए, और उन लोगों को कॉल या मैसेज कीजिए जो आपसे बात करना चाहते हैं, जिनके जीवन में आपकी अहमियत है। बाकी तो साल भर वही होता है — कि हम उन्हें ढूंढ़ते हैं, जिनके पीछे हम भागते रहते हैं। इस अवसर का फायदा उठाइए। ऐसे लोगों को मौका दीजिए — जो आपसे प्यार करते हैं, जिनके लिए आप वास्तव में महत्वपूर्ण हैं।
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चिंताओं को त्याग दीजिए। जीवन में बहुत चिंताएँ हैं, सबके पास चिंताएँ हैं, और आप किस चीज़ों से गुजर रहे हैं -- खासकर मानसिक स्वास्थ्य और मानसिक तनाव के संदर्भ में, जिसके विषय में कोई और नहीं जान सकता। एक्सीडेंट हो जाता है, हाथ टूट जाता है, पैर टूट जाता है - हर कोई देख सकता है, पूछ सकता है, मरहम लगा सकता है, दवाई दे सकता है, प्लास्टर लगा सकता है, और ठीक हो जाता है। दस लोग पूछते भी हैं - घर वाले, दोस्त। लेकिन अंदर की जो चोटें होती हैं, जो मानसिक स्वास्थ्य, मेंटल हेल्थ और मेंटल वेलनेस से जुड़ी होती हैं, उन्हें घर, परिवार या बहुत करीबी लोग भी नहीं समझ पाते। कई बार बहुत सारी इनसिक्योरिटीज होती हैं, कई कुकर्म भी होते हैं (मैं जिम्मेदारी से शब्दों का इस्तेमाल कर रहा हूँ) और ये सारी चीज़ें हम दूसरों के साथ साझा नहीं कर पाते, डर के कारण कि कहीं हमारी प्राइवेसी लीक न हो जाए। बहुत सारी चीज़ें ऐसी होती हैं जिन्हें केवल हम ही समझ सकते हैं। जिस पर से गुजरता है, वही समझ सकता है। माता-पिता, भाई-बहन, दोस्त, प्रेमी, डॉक्टर, काउंसलर, साइकोलॉजी के स्टूडेंट या साइकोलॉजिस्ट, कोई भी पूरी तरह नहीं समझ पाता। उन चीज़ों को आपको ही समझना होता है। लेकिन जो त्योहारों का सीजन है, उसे आप मनाइए। अपने परिवार को प्राथमिकता दीजिए। परिवार के साथ समय बिताइए, मोबाइल फोन और बाकी चीज़ों को दूर रखिए। दोस्तों के साथ समय व्यतीत कीजिए। अगर आपको लगता है कि किसी भी कीमत पर परिवार या दोस्तों के साथ समय नहीं बिता सकते, तो अकेले समय बिताइए। दीया जलाइए, रंगोली बनाइए, पकवान बनाइए, खाना बनाइए, नए-नए चीज़ें ट्राई कीजिए, एक्सप्लोर कीजिए, और खुश रहिए, हंसिए। अगर कोई कारण नहीं मिल रहा है खुश होने का, तो रात में सोते समय या अकेले होने पर बीस-पच्चीस मिनट खुलकर, ज़ोर से हँसिए। खुश रहने का प्रयास कीजिए। छोटे-छोटे चीज़ों को देखिए और समझिए। और जो इंसान आपसे बात करना चाहता है, उससे जरूर बात कीजिए। इससे आपको भी मानसिक संतुष्टि मिलेगी और सामने वाले को भी। अपने जीवन में आज तक जो भी महत्वपूर्ण रहा है, उसे इस दिवाली जरूर कॉल कीजिए। और जो लोग बहुत धार्मिक हैं, यदि दिवाली पर नहीं कर सकते, तो आगामी त्योहार जैसे ईद या क्रिसमस पर अपने सारे दोस्तों को ज़रूर कॉल करें। वैसे भी, त्योहार कोई भी हो, सबको मनाना चाहिए। खुशियाँ सबकी हैं। दिवाली, ईद, क्रिसमस — सबके लिए हैं। सबका उद्देश्य लगभग एक ही है।
22 जुलाई 2025 की यह सुबह हमारे लिए केवल एक तारीख नहीं है। यह एक विचार की वर्षगांठ है। यह उस क्षण का स्मरण है जब हमने विविधता, संवैधानिकता और समावेशिता के पक्ष में एक स्पष्ट आवाज उठाई - और उस आवाज़ को नाम दिया: सतरंगी सलाम। आज जब हम All India Satrangi Salaam Association (AISSA) की औपचारिक स्थापना का एक वर्ष पूर्ण होने का उत्सव मना रहे हैं, यह केवल एक संस्थागत उपलब्धि नहीं है, बल्कि हमारी साझा चेतना की विजय है। यह वह क्षण है जब हम पीछे मुड़कर देख सकते हैं - न केवल इस बात के लिए कि हमने क्या किया, बल्कि इस सवाल के लिए कि हमने ऐसा क्यों किया? 2020 में जब पहली बार "सतरंगी सलाम" नाम सामने आया, तब यह कोई NGO, ट्रस्ट या संगठन नहीं था। यह एक विचार था, एक प्रतिक्रिया थी उस माहौल के खिलाफ जो लोगों को रंगों, जातियों, धर्मों और भाषाओं में बाँट रहा था। कभी रंगों को हथियार बनाया गया, कभी नामों को। कोई भगवा से डरता था, कोई हरे से चिढ़ता था, कोई नीले को अलगाव का प्रतीक मानता था। जबकि इंद्रधनुष ने हमें सिखाया कि हर रंग की अपनी जगह होती है, और हर रंग से मिलकर ही एक पूरी तस्वीर बनती है। इसलिए हमने उस विचार को नाम दिया - सतरंगी सलाम। 16 जून 2024 को प्रयागराज में कंपनी गार्डन में जब पहली बार हमारे कुछ साथियों ने मिलकर एक सभा आयोजित की, तब हममें से किसी को यह अंदाज़ा नहीं था कि यह आंदोलन एक ट्रस्ट का रूप ले लेगा। लेकिन फिर भी हमने सोचा - यदि हम इस सोच को औरों तक पहुँचाना चाहते हैं, तो एक ढांचा ज़रूरी है। 22 जुलाई 2024 को प्रस्ताव पारित हुआ और 2 अगस्त को AISSA भारतीय ट्रस्ट अधिनियम के अंतर्गत पंजीकृत संस्था बन गई। संघर्ष, संवाद और समर्पण एक वर्ष की यह यात्रा आसान नहीं थी। यह केवल आयोजन, अभियान, या कार्यक्रमों की लिस्ट नहीं है - यह विचारों के टकराव, आलोचनाओं, समर्थन, और लगातार सीखने का सिलसिला रहा है। हमने जाना कि बदलाव की प्रक्रिया सीधी रेखा में नहीं चलती। कई बार वह ठहरती है, कई बार वह बिखरती है, लेकिन फिर वही बिखरे हुए टुकड़े हमें नई दिशा देते हैं। इस साल में हमने सिर्फ समाज में काम नहीं किया - हमने अपने भीतर भी काम किया। हमने यह सीखा कि दूसरों की बात को सुनना कितना ज़रूरी है। यह भी कि समावेशिता का अर्थ केवल विविधता को गिनना नहीं, बल्कि उसे जीना और सम्मान देना है। नाम नहीं, काम का उत्सव आज के दिन यह कहना आसान होता कि हमने यह किया, वह किया - लेकिन आज का दिन संख्या गिनने का नहीं, बल्कि सार्थकता समझने का है। अगर किसी छात्र को संविधान का एक अनुच्छेद समझ आया, अगर किसी महिला को पहली बार अपने अधिकार का बोध हुआ, अगर किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति को मंच मिला बोलने का, अगर किसी वंचित को यह महसूस हुआ कि वह अकेला नहीं है - तो यही हमारा काम है, और यही हमारा उत्सव है। आभार: हर साथ के लिए एक सलाम इस आंदोलन में कोई एक नेता नहीं है, कोई एक लेखक नहीं, कोई एक दिशा नहीं - यह सभी की सहभागिता से बना ताना-बाना है। किसी ने समय दिया, किसी ने विचार। किसी ने अपनी कला दी, किसी ने चुपचाप साथ दिया। किसी ने आलोचना की, जिससे हमने बेहतर किया। किसी ने मंच पर आवाज़ दी, किसी ने मैदान में पसीना बहाया। आप सभी को सतरंगी सलाम - इस विचार को जीवित रखने के लिए। भविष्य की ओर - जो हम सबका है आज हम एक वर्ष पूरे कर रहे हैं, लेकिन यह समाप्ति का बिंदु नहीं, बल्कि नए संकल्पों की शुरुआत है। हमने जो भी पाया है - वह केवल शुरुआत है। जो खोया है - वह सीख है। और जो बाकी है - वह हमारा दायित्व। AISSA कोई "विशेष समुदाय" के लिए नहीं है - यह हर उस व्यक्ति के लिए है जो संविधान में विश्वास रखता है, जो विविधता का सम्मान करता है, और जो बिना भेदभाव के न्याय, समानता और गरिमा की बात करता है। आह्वान: आइए साथ चलें अगर आप भी इस विश्वास को साझा करते हैं कि कोई रंग छोटा नहीं होता, कोई आवाज़ अनसुनी नहीं होनी चाहिए, कोई सवाल गलत नहीं होता, और कोई भी पीछे नहीं छूटना चाहिए - तो आइए, हमारे साथ चलिए। आपका साथ आंदोलन को दिशा देगा। आपकी भागीदारी बदलाव को गति देगी। निष्कर्ष सतरंगी सलाम कोई संस्था नहीं - यह एक स्वप्न है, एक संघर्षशील उम्मीद, जो हर किसी के भीतर छिपी उस आकांक्षा को आवाज़ देती है जो कहती है - "मुझे बराबरी चाहिए, सम्मान चाहिए, और सबसे पहले - एक जगह चाहिए।" इस स्थापना दिवस पर हम उसी जगह को और पुख्ता कर रहे हैं। आप भी साथ चलें - क्योंकि बदलाव अकेले नहीं आता, उसे साथ लाना पड़ता है।
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एक मिनट रुकिए और सोचिए... मान लीजिए, आपको HIV है और आप इसे छुपा कर दूसरों से संपर्क करते हैं। क्या आप सिर्फ एक संक्रमित व्यक्ति हैं, या किसी की जान के साथ खेल रहे हैं? HIV संक्रमण का फैलाव सिर्फ यौन संबंधों से नहीं होता - यह शेविंग ब्लेड, टूथब्रश, खून का संपर्क, और अन्य माध्यमों से भी हो सकता है। अगर आप HIV पॉजिटिव हैं, तो यह आपकी ज़िम्मेदारी है कि आप दूसरों को संक्रमण से बचाएं। HIV - केवल एक यौन रोग नहीं HIV केवल यौन संबंधों से नहीं फैलता। यह संक्रमण शेविंग के दौरान ब्लेड, टूथब्रश, खून के संपर्क, सैलून पर बाल कटवाने जैसी लापरवाहियों से भी फैल सकता है। इससे न सिर्फ उस व्यक्ति को नुकसान होता है, बल्कि यह उसके परिवार, दोस्तों और समाज तक फैल सकता है। इसलिए, अगर आप HIV संक्रमित हैं, तो आपको न केवल खुद को बचाना है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि आप दूसरों को संक्रमण से बचाएं। कानूनी पक्ष: HIV फैलाना अपराध है आज के समय में HIV फैलाना केवल नैतिक अपराध नहीं, बल्कि यह कानूनी अपराध भी है। भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 और HIV/AIDS रोकथाम अधिनियम, 2017 के तहत यह साफ़ कहा गया है कि HIV संक्रमित व्यक्ति को अपने संक्रमण की जानकारी अपने यौन साथी को देना अनिवार्य है, और जानबूझकर या लापरवाही से संक्रमण फैलाना अपराध है। BNS धारा 124 (पूर्व की IPC धारा 270) - जानबूझकर संक्रमण फैलाने की कोशिश पर 2 साल तक की कैद और जुर्माना हो सकता है। BNS धारा 122 (पूर्व की IPC धारा 269) - लापरवाही से संक्रमण फैलाने पर 6 महीने की कैद और जुर्माना हो सकता है। HIV/AIDS (रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम, 2017 के तहत भी, यदि कोई व्यक्ति अपने HIV संक्रमण के बारे में अपने साथी को नहीं बताता, तो यह अपराध माना जाता है। इस पर 3 महीने से 2 साल तक की कैद और जुर्माना हो सकता है। आपका संक्रमण - आपकी ज़िम्मेदारी यदि आप HIV पॉजिटिव हैं, तो यह आपकी जिम्मेदारी बनती है कि आप दूसरों को संक्रमण से बचाने के लिए: HIV के इलाज की शुरुआत करें (ART थेरेपी) सुरक्षित यौन संबंध बनाएं, जैसे कंडोम का उपयोग करना स्वच्छता के लिए व्यक्तिगत सामान (जैसे ब्लेड, टूथब्रश) साझा न करें अपनी स्थिति के बारे में ईमानदारी से संवाद करें समाज की सुरक्षा - आपका कर्तव्य संक्रमण फैलाना किसी के लिए भी आसान नहीं है, लेकिन इससे बचने के लिए आपको अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। अगर आप HIV पॉजिटिव हैं, तो आपको अपने परिवार, दोस्तों, और साथियों को संक्रमण से बचाने के लिए सच बताना चाहिए और ज़रूरी कदम उठाने चाहिए। HIV संक्रमित व्यक्ति के लिए: इलाज के साथ साथ यह सुनिश्चित करें कि आप दूसरों को सुरक्षित रखें। सामाजिक सुरक्षा: सभी को इस खतरनाक संक्रमण से बचाना हमारा सामूहिक कर्तव्य है। HIV फैलाना कानूनी और नैतिक रूप से गंभीर अपराध है। कोई भी व्यक्ति, जो HIV पॉजिटिव होते हुए भी जानबूझकर या लापरवाही से दूसरों को संक्रमित करता है, उसे कानूनी सजा का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए, अगर आप HIV संक्रमित हैं: इलाज कराएं, सच बताएं, और सुरक्षित यौन संबंध अपनाएं। सिर्फ खुद की नहीं, दूसरों की भी सुरक्षा करें। HIV फैलाना अपराध है - इसे समझिए और अपनी ज़िम्मेदारी निभाइए।
By: Shivam Das
इस जीवन में मां से महान कुछ नहीं मां अर्थात नारी नारी सम्मान के लिए नहीं सम्मान नारी के लिए बना है सीता की जैसा सतीत्व नारी द्रोपदी के जैसा विनाश नारी दुर्गा के जैसा कल्याण नारी संतोषी के जैसा संतोष नारी महिला एक शब्द ही नहीं महिला धरा पर धरा का वजूद है नारी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं आज का दिन नारी के सम्मान में हम सब नारी सम्मान का शपथ लें
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अंतर्राष्ट्रीय कंडोम दिवस हर साल 13 फरवरी को मनाया जाता है। <br> यह दिन लोगों को याद दिलाने के लिए है कि कंडोम यौन संचारित रोगों (एसटीआई), एचआईवी, और अनचाहे गर्भधारण को रोकने का एक सुरक्षित और प्रभावी तरीका है। <br> एड्स हेल्थकेयर फाउंडेशन (एएचएफ), एक अमेरिकी आधारित गैर-लाभकारी संगठन, ने 2009 में अंतर्राष्ट्रीय कंडोम दिवस की स्थापना की। <br> आइए मिलकर सुरक्षित भविष्य की ओर बढ़ें ! अंतर्राष्ट्रीय कंडोम दिवस पर, हम आपको याद दिलाते हैं कि सुरक्षित सेक्स न केवल आपके स्वास्थ्य के लिए जरूरी है, बल्कि यह आपके भविष्य को भी सुरक्षित बनाता है । तो आइए, सुरक्षित सेक्स के बारे में जागरूकता फैलाएं और अपने प्रेम को सुरक्षित बनाएं ! आज, हम अंतर्राष्ट्रीय कंडोम दिवस मना रहे हैं, जो सुरक्षित सेक्स और यौन स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है । इस दिन का उद्देश्य लोगों को सुरक्षित सेक्स के महत्व के बारे में शिक्षित करना और उन्हें अपने यौन स्वास्थ्य की रक्षा करने के लिए प्रेरित करना है । हमारे देश में, यौन संचारित रोगों (एसटीआई) और अनचाहे गर्भधारण की दरें अभी भी बहुत अधिक हैं। इसका मुख्य कारण लोगों की जागरूकता की कमी और सुरक्षित सेक्स के बारे में गलत धारणाएं हैं । इसलिए, हमें सुरक्षित सेक्स के महत्व के बारे में जागरूकता फैलाने और लोगों को अपने यौन स्वास्थ्य की रक्षा करने के लिए प्रेरित करने की आवश्यकता है। आइए मिलकर सुरक्षित सेक्स के बारे में जागरूकता फैलाएं और अपने समुदाय में यौन स्वास्थ्य को बढ़ावा दें। <br> <br> सुरक्षित सेक्स = सुरक्षित भविष्य <br> <br> # सतरंगी सलाम (पंजीकृत ट्रस्ट) इस दिशा में और क्या कर सकता है ? कृपया अपना सुझाव दे
By: Harshit Srivastava
On April 24, 2015, history was made when the Rajya Sabha unanimously passed the Rights of Transgender Persons Bill, 2014. This landmark legislation aimed to recognize and protect the rights of transgender individuals, guaranteeing them entitlements such as education, healthcare, and housing. One of the most progressive aspects of the bill was the provision for reservations in education and government jobs, with a proposed 2% quota to ensure representation and upliftment of the marginalized community. However, as we step into 2025, the stark reality is that this bill, though revolutionary on paper, remains largely unimplemented across the nation. While it signifies a monumental step towards inclusivity, the lack of nationwide enforcement has rendered its promises hollow. The Status Quo: A Fragmented Effort In the ten years since its passage, only two states—Madhya Pradesh and Karnataka—have taken concrete steps to implement reservation policies for the transgender community. Madhya Pradesh has provided horizontal reservation by including transgender persons under the Other Backward Classes (OBC) category. This ensures that transgender individuals, irrespective of their caste or community, are entitled to benefits under the OBC reservation framework. Karnataka, on the other hand, has taken a bolder step by introducing vertical reservation of 1% specifically for transgender persons in government jobs. This move stands as a shining example of proactive policymaking that acknowledges the unique socio-economic struggles faced by the community. However, these efforts remain isolated. The absence of a pan-India policy creates a glaring disparity, leaving most transgender individuals across the country without access to the benefits promised by the bill. The Case for Immediate Implementation The challenges faced by the transgender community are deeply entrenched in systemic discrimination, social ostracization, and economic marginalization. The lack of affirmative action has perpetuated cycles of poverty and exclusion. A nationwide implementation of reservation policies is not merely a legal obligation; it is a moral imperative to address these historical injustices. If vertical reservations—such as Karnataka's 1% policy—are deemed administratively challenging to implement immediately, horizontal reservations akin to those provided for women should be adopted across all states and union territories. Horizontal reservations would ensure that transgender individuals receive equitable opportunities within existing reservation frameworks, without disrupting the current quota system. The Demand for Justice We call for the immediate pan-India acceptance and enforcement of the Rights of Transgender Persons Bill, 2014. Every state and union territory must rise to the occasion and ensure the following: Horizontal Reservations Nationwide: At the very least, transgender individuals should be entitled to horizontal reservation within existing categories, similar to the reservations provided for women. Awareness and Sensitization Campaigns: Governments must invest in educating both society and administrative bodies about the rights and entitlements of transgender persons to eliminate discrimination. Regular Monitoring and Reporting: A central authority should monitor the implementation of these policies and release periodic reports to ensure compliance. Conclusion The transgender community in India has waited long enough for the promises of 2015 to materialize. It is the collective responsibility of both the government and society to ensure that these rights are not just theoretical commitments but tangible realities. As Madhya Pradesh and Karnataka have demonstrated, change is possible when there is political will and administrative determination. It is time for the rest of India to follow suit. Let us not allow this landmark bill to become yet another forgotten piece of legislation. Instead, let it serve as a testament to India's commitment to justice, equality, and inclusivity for all its citizens.
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एक तरफ तो हमारे यहाँ औरतों को देवी दुर्गा के रूप में पूजा जाता है और दूसरी तरफ औरत को अपने नाम व पहचान का भी हक़ नहीं दिया जाता है ? कुल मिला करके लोग मात्र सत्ता व पावर से ही डरते है इसीलिए तो देवियों को विभिन्न प्रकार के अस्त्र शस्त्र से सुशोभित दिखाया जाता है । औरत किसी भी मुकाम पर पहुँच जाए, आखिर उस पर सवाल क्यो उठाया जाता है ? और अचरज की बात है कि सवाल उठाने वालों में भी औरते ही होती है क्या एक सोची समझी साजिश के तरह औरतों को औरतों के खिलाफ सोचने के लिए मजबूर कर दिया गया है ? औरतो को बचपन में कोई पहचान ही नहीं होता है, माता पिता व समाज केवल पुरुष संतान को ही गिनती है जिनके 5 लडकिया व 1 लकड़ा होता है, वे सीधे बोलते है कि हमार बाबू अकेले बा शादी के बाद औरत को फलाने की बीबी व बहु ही बुलाया जाता है और बाद में फलाने की मम्मी मैं ऐसे तमाम औरतो से मिला हूँ, जिनको अपने दादी तक का नाम नहीं मालूम औरतो को रीति रिवाजों के चंगुल में इस कदर फंसाया गया है कि वे अगले 50 सालो तक नहीं निकल पाएंगे आप लिस्ट देखेंगे तो तमाम पदों पर अभी तक कोई भी ‘गैर पुरुष’ पहुँच ही नहीं पाया है या यूं कहें कि किसी भी औरत को इन पदों पर पहुचने ही नहीं दिया गया है और अधिकांश पदों पर तो बस गिने चुने औरते ही पहुँच सकी है जब औरतो के साथ इस कदर भेदभाव होता है तो फिर आप ट्रांसजेंडरों के साथ होने वाले भेदभावों की कल्पना कर ही सकते है आप के घर में ही जब किसी चीज पर चर्चा होती है तो घर के औरतो को चुप करवाते हुए पुरुषों को आप ने देखा ही होगा आप के घर में पुरुष लड़को व महिला लकड़ियों के बीच भेदभाव आप ने देखा ही होगा किसी भी यूनिवर्सिटी में लड़कियों की संख्या लड़को के मुकाबले इतनी कम क्यो होती है ? इलाहाबाद यूनिवर्सिटी हो या फिर प्रयागराज में रहने वाले विद्यार्थियों की बात हो, लड़कियों का अनुपात इतना कम क्यो है ? जब लड़कियों को आगे नहीं बढ़ने दिया जाता है तो फिर आप ट्रांसजेंडरों के विषय में सोच ही सकते है कि उन्हें माँगने की जरूरत क्यो होती है लड़कियों के लिए तो कम से कम एक घिसी पिटी सी सामाजिक व्यवस्था तो बना ही है कि उनकी शादी हो जाएगी और बच्चे हो जाएंगे लेकिन किन्नरों, हिजड़ो (ट्रांसजेंडरों) के लिए तो ऐसी भी कोई व्यवस्था नहीं है तो फिर ट्रांसजेंडर करे तो करे क्या ? अगर वे ट्रेन में और शादी विवाह में मांगे ना तो फिर अपना व अपने साथियों का गुजर बसर कैसे करें ? ट्रांसजेंडरों को माँगने पर भी कुछ नहीं मिलता था इसीलिए वे लोग थोड़ा सा जोर ज़बरदस्ती पर उतर आए , ये उनकी मजबूरी थी हालांकि कुछ शरारती तत्वों ने इन चीजो का गलत उपयोग किया और ट्रांसजेंडरों के नाम पर उगाही शुरू कर दी समलैंगिकों व LGBTQ+ समुदाय के लिए क्या विकल्प मौजूद है ? जितने भी लोग बहुमत के खिलाफ है, उनके लिए क्या विकल्प है ? बहुमत का मतलब सही नहीं होता है कोई बात 90 लोग बोले फिर भी वो गलत हो सकता है और अगर कोई बात मात्र 10 लोग बोले फिर भी वो सही हो सकता है और हम सबने देखा है कि समाज हमेशा गलत ही साबित हुआ है क्या समाज कभी भारत की आजादी चाहती थी ? आखिरी समय तक तमाम लोग अंग्रेजो के चाटुकार बने रहे थे अगर समाज की सुनी गई होती तो क्या सती प्रथा का अंत हो पाता ? अगर समाज की सुनी गई होती तो क्या बेटियों व औरतो को इतने अधिकार मिलते ? कभी सोचा है कि आखिर ट्रांसजेंडर मंगाने के लिए मजबूर क्यो है ? अब जब धीरे धीरे ट्रांसजेंडरों को मौका मिल रहा है तो वे भी आगे आ रहे है और पदों पर विराजमान हो रहे है हम मांग करते है कि जातिगत आरक्षण की समीक्षा की जाए और जिन जातियों को अच्छी प्रतिनिधित्व प्राप्त हो गई है, उन्हें आरक्षण से बाहर किया जाए अधिकारी रैंक के परिजनों को आरक्षण ना दिया जाए आरक्षण को प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के साथ साथ गरीबी खत्म करने का भी माध्यम बनाया जाए हम मांग करते है कि महिलाओं को हर जगह 40% आरक्षण दिया जाए और ट्रांसजेंडर व अन्य दूसरे लैंगिक अल्पसंख्यकों को 3% आरक्षण दिया जाए आरक्षण को शुरुआती दौर पर दिया जाए सभी को बराबरी का मौका मिले, आरक्षण इसके लिए होना चाहिए जन्म से ले करके पढ़ाई लिखाई तक होने वाले भेदभावों को खत्म करने के लिए आरक्षण होना चाहिए औरतो को नाम तक का हक नहीं है तो फिर आप क्या ही उमीद करते है कि LGBTQ+ अधिकारों के लिए क्या ही कुछ होगा ? आप क्या सोचते है, कमेंट करके जरूर बताए । सभी मुद्दे (विषय) एक दूसरे से सम्बंधित होते है । हमारा उद्देश्य किसी के भावनाओं को आहत करना नहीं है । हम भारतीय संविधान का पूरा आदर, सम्मान व पालन करते है । हम सभी धर्मों का आदर व सम्मान करते है ।
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